वृन्दावन (वृन्दावन इन्साफ, २०१०-०५-११) – भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चा की एक बैठक सम्पन्न हुई, जिसमें साधु समाज, पण्डा समाज और ब्राह्मण समाज व अन्य लोगों ने काफी सङ्ख्या में भाग लिया ।
महन्त श्री फूलडोल विहारीदासजी ने कहा कि कुम्भ मेला स्थित सारी जगह साधु-नागा बाबाओं की है । इस कुम्भ मेला की जगह पर माफियाओं की कडी दृष्टि लगी हुई है । वह इस जमीन पर कब्जा करना चाहते हैम् । यह कुम्भ मेला की जगह छोड दी जाये, यही हमारा जिलाधिकारी महोदय से निवेदन है ।
राष्ट्रीय अध्यक्ष मुनेश शर्मा (राम गुरु) ने कहा कि वृन्दावन में काफी बडे सम्मेलन लगते रहते हैम् । लेकिन उसके लिए कोई उपयुक्त स्थान नहीं है । कुम्भ मेले की जमीन पर साधु-सन्तों द्वारा किसी भी सम्मेलन का विशाल आयोजन किया जा सकता है । जो लोग इस जमीन को अपना बताते हैं, उन पर इसके कोई भी कागजात नहीं हैम् । इसलिए यह जगह नागा बाबाओं की ही है ।
महन्त श्री नगर अध्यक्ष चैतन्य चरण महाराज ने कहा कि हम प्रशासन से अनुरोध करते हैं कि यमुना मैया के किनारे स्थित कुम्भ मेले की जगह पर हर साल मेले का आयोजन किया जाये, जिससे माफिया इस जगह पर कब्जा नहीं डाल पायेंगे ।
मोर्चे के जिलाध्यक्ष पं विनोद शर्मा ने कहा कि वृन्दावन के नागरिक और बाहर से आनेवाला दर्शनार्थी इस जगह का भरपूर आनन्द उठाएंगे । अब कुम्भ मेला स्थल का शीघ्र से शीघ्र कुम्भ मेला क्षेत्र घोषित किया जाए ।
बैठक में सर्वश्री राष्ट्रीय महा सचिव महेन्द्र भ्रंग एडवोकेट, राष्ट्रीय सचिव विहारीलाल वशिष्ठ, अरविंद तिवारी, मुकेश शर्मा, बबलू बीज भण्डार, सोनू शास्त्री, महेश (अटलजी), उपेन्द्र गोस्वामी, पवन पोशाक वाला, जगन अग्रवाल, गैला पण्डित, सुरेश शर्मा आदि लोग उपस्थित थे ॥
Tuesday, May 11, 2010
Friday, May 7, 2010
श्रीधाम वृन्दावन को सुरक्षित और सुन्दर बनाने का संकल्प
वृन्दावन (वृन्दावन इन्साफ, २०१०-०५-११) – ब्रज वृन्दावन हेरिटेज एलायंस की एक बैठक बुधवार को किशोरवन मेम् आयोजित की गई, जिसमें प्राचीन भजन स्थली किशोरवन की लता-पताओं को पुनः आच्छादित कर सुन्दर बनाने का संकल्प किया गया ।
इस अवसर पर विनायक सेवा समिति के अध्यक्ष आचार्य नरेश नारायण ने कहा कि किशोरवन को पुनः करे वृक्षों से आच्छादित कर प्राचीन कुंज-निकुंजों का स्वरूप पुनः तैयार करने का संकल्प लिया गया है, क्योंकि वृन्दावन भगवान् श्रीकृष्ण की क्रीडास्थली है ।
सभासद श्रीमती सीता अग्रवाल ने कहा कि हम सभी को वृन्दावन को पुनः दर्शनार्थ एवं वंदनीय बनाने का संकल्प लेना है । चन्द्रप्रकाश शर्मा ने कहा संस्था ने जो ठोस कार्य करने का वीणा उठाया है, वह वृन्दावन को पुनः प्राचीन स्वरूप दिलाने में सहायक सिद्ध होगा । सुश्री प्रतिभा शर्मा एडवोकेट ने कहा ब्रजवासियों को यमुना के पुराने स्वरूप को बहाल करने के लिये यमुना किनारे भी व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण करने चाहिये ।
बैठक में श्री सुरेश त्रिपाठी, सुरेश चन्द्र शर्मा, बालकृष्ण गौतम, भागवत्.आत्म गोपाल, राम नारायण ब्रजवासी आदि ने भी अपने अपने विचार व्यक्त किये ।
इस से पूर्व भजन गायक पं दामोदर महाराज ने मंगला.चन्द्र में ब्रज महिला का वर्णन कर सभी को मन्त्रमुग्ध कर दिया । इस अवसर पर डा. देवेन्द्र चैतन्य ब्रह्मचारी, के.जी. गुप्ता, निर्गुणा दासी, जगदानन्द दास, अरुण कृष्ण दास, इन्द्र आहूजा, सत्यमूर्ति सारस्वत, जगन्नाथ पोद्दार, सीता अग्रवाल, डा. चन्द्रप्रकाश शर्मा आदि अनेक लोग उपस्थित थे । संचालन मधुमंगल शुक्ला एवम् आभार व्यक्त किशोरवन के सेवायत श्री गोविन्द किशोर गोस्वामी जी ने किया ॥ और देखिये
Sunday, May 2, 2010
वृन्दावन की मूल संस्कृति का ध्यान रख कर ही विकास कार्य हो
रवीन्द्र कुमार कुलश्रेष्ठ
वृन्दावन (वृन्दावन इन्साफ) : व्रज वृन्दावन हैरिटेज एलायंस की एक बैठक श्री राधा गोकुलानन्द मन्दिरे के प्रांगण में मन्दिरे के महन्त श्री निताइदास महाराज की अध्यक्षता में हुई । बैठक को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्री कृष्णगोपाल गुप्ता ने कहा कि वृन्दावन की शोभा यहां की कुंज गलियों से है । यहां पर अनावश्यक सड़क चौड़ीकरण करके यहां के मठ-मन्दिरो एवं व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को न तोडा जाये ।
उन्होंने कहा कि सड़क के किनारे बनाये जा रहे इतने गहरे नाले बनाने से नालों की सफाई नहीं हो पायेगी, जिससे उफनते हुए नाले आनेवाले तीर्थ यात्रियों पर बुरा प्रभाव डालेगा ।
स्वामी सेवक शरण ने कहा कि सड़क चौड़ीकरण करते समय यदि कोई वृक्ष बीच मेम् आता है तो उसे काटा नहीं जाना चाहिये, बल्कि विभागीय अधिकारियों को सड़क के नक्शे को बदल देना चाहिये । उन्होंने कहा कि एक प्राचीन वृक्ष का मुकाबला नये पौधे नहीं कर सकते ।
पंo बालकृष्ण गौतम ने कहा कि हम सभी ब्रजवासियों का कर्तव्य है कि हम ब्रज के धरोहर एवं संस्कार को सुरक्षित रखेम् । जिसमें पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव हमारे संस्कार में न पडे ।
पण्डा सभा के उपाध्यक्ष श्री रामनारायण ब्रजवासी ने कहा कि वृन्दावन तथा इसके आस-पास के क्षेत्रों में शराब का ठेका नहीं उठने देना चाहिये । उन्होंने कहा कि वृन्दावन में मांस और मदिरा पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगन चाहिये ।
आचार्य श्रीवत्स गुणत्वी ने मांग की कि वृन्दावन को तीर्थ स्थल घोषित किया जाये । उन्होंने कहा कि कुंभ मेला क्षेत्र को संरक्षित करके उसे मेला भूमि घोषित किया जाये, जिससे कि उस स्थान पर ब्रज यात्रा के पडाव डाला जा सके । उस स्थान का उपयोग बडे-बडे कथाओं का आयोजन करने के लिये किया जा सकता है ।
मधुमंगल शुक्ला ने कहा कि यमुना संचरण भूमि से अतिक्रमण हटाना चाहिये, जिससे यमुना के प्रवाह में कोई बाधा उत्पन्न न हो ।
मीराबाई मन्दिर के महन्त श्री प्रद्युम्न प्रताप महाराज ने कहा कि वृन्दावन में तीन मंजिला इमारत से अधिक मंजिल वाले भवन बनाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिये । उन्होंने कहा कि वृन्दावन को तीर्थ भूमि बनाये रखना चाहिये तथा इसे मुम्बाई-दिल्ली के तर्ज पर नहीं बनाया जाना चाहिये ।
विनायक सेवा समिति के अध्यक्ष आचार्य नरेश नारायण ने कहा कि भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित मन्दिरों की हाल दिन-प्रतिदिन बदतर होती जा रही है । विभाग द्वारा इन स्मारकों के ऊपर कोई भी ध्यान नहीं दिया जा रहा है । इनके मन्दिरों को चारोम् और अवैध निर्माण हो रहा है और विभागीय अधिकारी कुम्भकर्णी नींद सो रहे हैम् ।
इस बैठक में डाo देवेन्द्र चैतन्य, आचार्य सुरेश वेदपाठी, विक्रान्त अग्रवाल, कन्हैया गुप्ता, अशोक गुप्ता, अनन्त किशोर शरण, श्रीमती मालती आदि ने विचार व्यक्त किया ॥
वृन्दावन (वृन्दावन इन्साफ) : व्रज वृन्दावन हैरिटेज एलायंस की एक बैठक श्री राधा गोकुलानन्द मन्दिरे के प्रांगण में मन्दिरे के महन्त श्री निताइदास महाराज की अध्यक्षता में हुई । बैठक को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्री कृष्णगोपाल गुप्ता ने कहा कि वृन्दावन की शोभा यहां की कुंज गलियों से है । यहां पर अनावश्यक सड़क चौड़ीकरण करके यहां के मठ-मन्दिरो एवं व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को न तोडा जाये ।
उन्होंने कहा कि सड़क के किनारे बनाये जा रहे इतने गहरे नाले बनाने से नालों की सफाई नहीं हो पायेगी, जिससे उफनते हुए नाले आनेवाले तीर्थ यात्रियों पर बुरा प्रभाव डालेगा ।
स्वामी सेवक शरण ने कहा कि सड़क चौड़ीकरण करते समय यदि कोई वृक्ष बीच मेम् आता है तो उसे काटा नहीं जाना चाहिये, बल्कि विभागीय अधिकारियों को सड़क के नक्शे को बदल देना चाहिये । उन्होंने कहा कि एक प्राचीन वृक्ष का मुकाबला नये पौधे नहीं कर सकते ।
पंo बालकृष्ण गौतम ने कहा कि हम सभी ब्रजवासियों का कर्तव्य है कि हम ब्रज के धरोहर एवं संस्कार को सुरक्षित रखेम् । जिसमें पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव हमारे संस्कार में न पडे ।
पण्डा सभा के उपाध्यक्ष श्री रामनारायण ब्रजवासी ने कहा कि वृन्दावन तथा इसके आस-पास के क्षेत्रों में शराब का ठेका नहीं उठने देना चाहिये । उन्होंने कहा कि वृन्दावन में मांस और मदिरा पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगन चाहिये ।
आचार्य श्रीवत्स गुणत्वी ने मांग की कि वृन्दावन को तीर्थ स्थल घोषित किया जाये । उन्होंने कहा कि कुंभ मेला क्षेत्र को संरक्षित करके उसे मेला भूमि घोषित किया जाये, जिससे कि उस स्थान पर ब्रज यात्रा के पडाव डाला जा सके । उस स्थान का उपयोग बडे-बडे कथाओं का आयोजन करने के लिये किया जा सकता है ।
मधुमंगल शुक्ला ने कहा कि यमुना संचरण भूमि से अतिक्रमण हटाना चाहिये, जिससे यमुना के प्रवाह में कोई बाधा उत्पन्न न हो ।
मीराबाई मन्दिर के महन्त श्री प्रद्युम्न प्रताप महाराज ने कहा कि वृन्दावन में तीन मंजिला इमारत से अधिक मंजिल वाले भवन बनाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिये । उन्होंने कहा कि वृन्दावन को तीर्थ भूमि बनाये रखना चाहिये तथा इसे मुम्बाई-दिल्ली के तर्ज पर नहीं बनाया जाना चाहिये ।
विनायक सेवा समिति के अध्यक्ष आचार्य नरेश नारायण ने कहा कि भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित मन्दिरों की हाल दिन-प्रतिदिन बदतर होती जा रही है । विभाग द्वारा इन स्मारकों के ऊपर कोई भी ध्यान नहीं दिया जा रहा है । इनके मन्दिरों को चारोम् और अवैध निर्माण हो रहा है और विभागीय अधिकारी कुम्भकर्णी नींद सो रहे हैम् ।
इस बैठक में डाo देवेन्द्र चैतन्य, आचार्य सुरेश वेदपाठी, विक्रान्त अग्रवाल, कन्हैया गुप्ता, अशोक गुप्ता, अनन्त किशोर शरण, श्रीमती मालती आदि ने विचार व्यक्त किया ॥
Tuesday, April 20, 2010
ब्रज वृन्दावन को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाये
आचार्य नरेश नारायण
वृन्दावन (वृन्दावन इन्साफ, April 20, 2010) : व्रज वृन्दावन हैरिटेज एलायंस के तत्त्वावधान में विश्व धरोहर दिन के अवसर पर रविवार दि. १८ अप्रैल २०१० को वृन्दावन में ब्रज के प्राचीन मन्दिरों एवं घाटों को संरक्षित करने के लिये प्राचीन गोविन्ददेव मन्दिर के सामने प्रदर्शन किया गया ।
इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि ब्रज वृन्दावन के समस्त प्राचीन मन्दिर, भवन, देवालय, जलाशय, टीले एवं घाटों को संरक्षित किया जाना चाहिये । गोविन्ददेव मन्दिर वास्तु शास्त्र के अनुसार लाल पत्थर से कलात्मक बना एक अद्वितीय मन्दिर है । इस मन्दिर को सुरक्षित रखने हेतु आवश्यक कार्यवाही जरूरी है । उन्होंने कहा कि प्रत्येक कला प्रेमी ब्रजवासी को इन ऐतिहासिक धरोहरों की रक्षा करना संकल्प लेना चाहिये ।
वृन्दावन की प्राचीन इमारतों के साथ-साथ यहां की संस्कृति को भी संरक्षित किया जाना चाहिये । मन्दिर के प्राचीन स्थल जीवन्त धरोहर हैं । उन्हें अब तक संरक्षण प्राप्त नहीं हुआ है । उन्होंने कहा ब्रज की कई प्राचीन इमारतें अवैध लोगों को गिरफ्त में आ चुकी हैं । जिन पर सरकारको ध्यान देकर कार्यवाही करनी चाहिये ।
इस अवसर पर प्रदर्शन करने वालों मे बालकृष्ण गौतम, अनुज गुणत्वी, आचार्य नरेश नारायण, स्वामी प्रद्युम्न प्रताप सिंह, राम नारायण ब्रजवासी, विष्णुदास, अशोक अग्रवाल, गोपाल शर्मा, मधुमङ्गल शुक्ला, प्रेम चन्द्र सरस्वती, सेवक शरण, जगन्नाथ पोद्दार, रवीन्द्र कुलश्रेष्ठ, कैलाश दीक्षित, श्रीधर शर्मा, पवन शुक्ला, रामबाबू शर्मा आदि उपस्थित थे ॥
Friday, March 26, 2010
लिव इन रिलेशन में नहीं थे राधा-कृष्ण
26.3.10 भड़ास blog
मथुरा। राधा और कृष्ण का अलौकिक प्रेम पहली बार बहस के केंद्र में आया है। लिव इन रिलेशन अदालती बहस के पहले से अस्तित्व में है। समय को कानून की दृष्टि से परिभाषित करने से समाज की अपनी धारा और बदलता वक्त बंधता भी नहीं है। सवाल यह नहीं है कि लिव इन रिलेशनशिप बदलते समय की जरुरत है या नहीं, सवाल यह है कि किस शिलालेख, साहित्य या शास्त्र में कहा गया है कि राधा-कृष्ण लिव इन रिलेशन में थे। कान्हा की नगरी में तो कहीं-कहीं कृष्ण खुद ही राधा रूप में नजर आते हैं तो कभी राधा और कृष्ण एक दिखते हैं।
बरसाना के लाडलीजी मंदिर में भगवान कृष्ण की कृष्ण के रूप में नहीं, सखी रूप में पूजा होती है। पूजा ही नहीं, उनका श्रृंगार भी सखी रूप में होता है। यहां दो अलग-अलग मूर्तियां जरूर हैं, लेकिन दोनों को सजाने-संवारने और पूजने में समानता रखी जाती है। भाव यही है कि दोनों एक ही हैं। किताबें कहती हैं कि कृष्ण ने किशोर वय पार करते-करते वृंदावन छोड़ दिया, जो उनकी रास लीलाओं के लिए ख्यात है। वह मथुरा आए और बारह साल की उम्र में कंस का संहार किया। कंस के वध की सूचना मिलने पर जरासंध मथुरा के लिए रवाना हो गया। जरासंध के आने की सूचना मिलते ही भगवान कृष्ण अपनी मुरली और मुकट यमुना किनारे छोड़कर गुजरात के लिए चले गये। उन्होंने गोपियों को समझाने के लिए उद्धव जी को भेजा। कृष्ण सबसे पहले डांगौरजी गये, जहां उनके रणछोर स्वरूप के दर्शन होते हैं।
कृष्ण को अकेले पूजने वाले भी हैं, राधा को मानने वाले भी हैं और दोनों की युगल छवि को पूजने वाले भी वैष्णव हैं। दोनों को लक्ष्मी-नारायण का रूप भी माना जाता है। कृष्ण को पूज्य मानने वाले वैष्णव उन्हें विष्णु का अवतार मानते हैं। शुरूआती पूजा की परंपरा को देखें तो दो शताब्दी ईसा पूर्व में पतंजलि का समय माना जाता है। तब वासुदेव कृष्ण के रूप में उनकी पूजा शुरू हुई, लेकिन उससे पहले उन्हें बाल कृष्ण के रूप में पूजा जाने लगा था। ग्रीक दूत मैगस्थनीज और कौटिल्य के अनुसार उन्हें सुप्रीम पावर के रूप में पूजा गया। भक्ति परम्परा में उनकी रास लीलाओं को जहां डिवाइन प्ले कहा गया है। सातवीं व नौैंवी शताब्दी से पहले दक्षिण भारत में उनकी भक्ति का प्रसार-प्रचार हुआ। बारह वीं शताब्दी में जब जयदेव का गीत-गोविंद आया तब उनकी रास लीला से लोग प्रभावित हुए और तब भी उनके अलौकिक रूप को ही पूजा गया। उत्तरी भारत में ग्यारह वीं शताब्दी में निबांकाचार्य, पंद्रहवी शताब्दी में वल्लभाचार्य और सोलह वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु ने उनके अलौकिक रूप को ही पहचान दी। और तो और वर्ष 1966 से जो भक्ति वेदांत आंदोलन पश्चिम के देशों में चल रहा है, वहां भी राधा-कृष्ण के रिश्तों को लौकिक रूप में परिभाषित करने का प्रयोग नहीं किया गया। इन देशों में लिव इन रिलेशनशिप सदियों से है।
इसी तरह परफार्मिग आर्ट्स में जो 150 ईसा पूर्व से प्रचलित हैं, उनमें भी ऐसे आख्यान या कथाएं नहीं हैं। दसवीं सदी से राधा-कृष्ण परफार्मिग आर्ट के सर्वाधिक लोकप्रिय चरित्र रहे हैं, लेकिन न तो उनकी भाव भंगिमा और न ही लोकोक्तियों में उनके शारीरिक मिलन की कोई कहानी सामने आती है। जहां तक पेटिंग्स का सवाल है तो कला के चितेरों ने अपनी कल्पना से उनके युवा रूप को ज्यादा दर्शाया है, जो काल्पनिक अधिक है। इन चित्रों में भी राधा-कृष्ण की लीलाओं को दर्शाने का प्रयास किया गया। चित्रों के माध्यम से राधा-कृष्ण को एक भी दर्शाया गया। अलावा इसके न तो ऐसी मान्यता वैष्णव और हिंदू समाज में रही है और न ही कोई साहित्य, शिलालेख, संस्कृति उनके लौकिक रूप को दर्शाती है।
Pawan Nishant (http://yameradarrlautega.blogspot.com)
मथुरा। राधा और कृष्ण का अलौकिक प्रेम पहली बार बहस के केंद्र में आया है। लिव इन रिलेशन अदालती बहस के पहले से अस्तित्व में है। समय को कानून की दृष्टि से परिभाषित करने से समाज की अपनी धारा और बदलता वक्त बंधता भी नहीं है। सवाल यह नहीं है कि लिव इन रिलेशनशिप बदलते समय की जरुरत है या नहीं, सवाल यह है कि किस शिलालेख, साहित्य या शास्त्र में कहा गया है कि राधा-कृष्ण लिव इन रिलेशन में थे। कान्हा की नगरी में तो कहीं-कहीं कृष्ण खुद ही राधा रूप में नजर आते हैं तो कभी राधा और कृष्ण एक दिखते हैं।
बरसाना के लाडलीजी मंदिर में भगवान कृष्ण की कृष्ण के रूप में नहीं, सखी रूप में पूजा होती है। पूजा ही नहीं, उनका श्रृंगार भी सखी रूप में होता है। यहां दो अलग-अलग मूर्तियां जरूर हैं, लेकिन दोनों को सजाने-संवारने और पूजने में समानता रखी जाती है। भाव यही है कि दोनों एक ही हैं। किताबें कहती हैं कि कृष्ण ने किशोर वय पार करते-करते वृंदावन छोड़ दिया, जो उनकी रास लीलाओं के लिए ख्यात है। वह मथुरा आए और बारह साल की उम्र में कंस का संहार किया। कंस के वध की सूचना मिलने पर जरासंध मथुरा के लिए रवाना हो गया। जरासंध के आने की सूचना मिलते ही भगवान कृष्ण अपनी मुरली और मुकट यमुना किनारे छोड़कर गुजरात के लिए चले गये। उन्होंने गोपियों को समझाने के लिए उद्धव जी को भेजा। कृष्ण सबसे पहले डांगौरजी गये, जहां उनके रणछोर स्वरूप के दर्शन होते हैं।
कृष्ण को अकेले पूजने वाले भी हैं, राधा को मानने वाले भी हैं और दोनों की युगल छवि को पूजने वाले भी वैष्णव हैं। दोनों को लक्ष्मी-नारायण का रूप भी माना जाता है। कृष्ण को पूज्य मानने वाले वैष्णव उन्हें विष्णु का अवतार मानते हैं। शुरूआती पूजा की परंपरा को देखें तो दो शताब्दी ईसा पूर्व में पतंजलि का समय माना जाता है। तब वासुदेव कृष्ण के रूप में उनकी पूजा शुरू हुई, लेकिन उससे पहले उन्हें बाल कृष्ण के रूप में पूजा जाने लगा था। ग्रीक दूत मैगस्थनीज और कौटिल्य के अनुसार उन्हें सुप्रीम पावर के रूप में पूजा गया। भक्ति परम्परा में उनकी रास लीलाओं को जहां डिवाइन प्ले कहा गया है। सातवीं व नौैंवी शताब्दी से पहले दक्षिण भारत में उनकी भक्ति का प्रसार-प्रचार हुआ। बारह वीं शताब्दी में जब जयदेव का गीत-गोविंद आया तब उनकी रास लीला से लोग प्रभावित हुए और तब भी उनके अलौकिक रूप को ही पूजा गया। उत्तरी भारत में ग्यारह वीं शताब्दी में निबांकाचार्य, पंद्रहवी शताब्दी में वल्लभाचार्य और सोलह वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु ने उनके अलौकिक रूप को ही पहचान दी। और तो और वर्ष 1966 से जो भक्ति वेदांत आंदोलन पश्चिम के देशों में चल रहा है, वहां भी राधा-कृष्ण के रिश्तों को लौकिक रूप में परिभाषित करने का प्रयोग नहीं किया गया। इन देशों में लिव इन रिलेशनशिप सदियों से है।
इसी तरह परफार्मिग आर्ट्स में जो 150 ईसा पूर्व से प्रचलित हैं, उनमें भी ऐसे आख्यान या कथाएं नहीं हैं। दसवीं सदी से राधा-कृष्ण परफार्मिग आर्ट के सर्वाधिक लोकप्रिय चरित्र रहे हैं, लेकिन न तो उनकी भाव भंगिमा और न ही लोकोक्तियों में उनके शारीरिक मिलन की कोई कहानी सामने आती है। जहां तक पेटिंग्स का सवाल है तो कला के चितेरों ने अपनी कल्पना से उनके युवा रूप को ज्यादा दर्शाया है, जो काल्पनिक अधिक है। इन चित्रों में भी राधा-कृष्ण की लीलाओं को दर्शाने का प्रयास किया गया। चित्रों के माध्यम से राधा-कृष्ण को एक भी दर्शाया गया। अलावा इसके न तो ऐसी मान्यता वैष्णव और हिंदू समाज में रही है और न ही कोई साहित्य, शिलालेख, संस्कृति उनके लौकिक रूप को दर्शाती है।
Pawan Nishant (http://yameradarrlautega.blogspot.com)
Wednesday, March 10, 2010
वृंदावन में रोड के लिए हेमामालिनी ने दिए 16 लाख
जिला मुख्यालय से मिली जानकारी के अनुसार सांसद हेमामालिनी ने मथुरा-वृंदावन मेन रोड से अक्रूर गांव स्थित गोधाम गौशाला की ओर जाने वाली सड़क के 600 मीटर हिस्से का कांक्रीट से निर्माण करने के लिए सांसद निधि से 16 लाख रुपये की राशि दी है।
Nava Bharata Times (March 10, 2010)
Wednesday, February 10, 2010
वृंदावन के ब्रह्म सरोवर का पुनरोद्धार
ब्रह्म कुंड का नया स्वरूप
तस्वीर में दिखाई दे रहा ब्रह्म सरोवर को देखकर आप सोच नहीं सकते कि यह तालाब कभी ऐसा नहीं था। पिछली सर्दियों में एक स्वयंसेवी समूह ने जब कचरे के ढेर तले दबे पौराणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण एक सरोवर का पुनरोद्धार कार्य आरंभ किया तो जनता आमतौर पर उदासीन थी। कुछ लोगों ने तो इसे समय की बर्बादी भी कहा था।
ब्रज रक्षक दल और ब्रज फाउंडेशन ने लोगों की प्रतिक्रिया की ओर ध्यान देते हुए ब्रह्म कुंड के पुनरोद्धार का अपना प्रयास आरंभ किया और इस समय यह सरोवर प्रतिदिन वृंदावन आने वाले हजारों तीर्थयात्रियों के आकर्षण का नया केंद्र बन गया है।
प्रसिद्ध रंगजी मंदिर के उत्तरी द्वार के पास स्थित ब्रह्म कुंड का उल्लेख वराह पुराण में भी मिलता है। यह शिव, योगमाया और चैतन्य महाप्रभु से भी जुड़ा हुआ है। ऐसी मान्यता है कि मीराबाई ने वृंदावन में अपनी प्रथम रात्रि इसी पवित्र कुंड के पास व्यतीत की थी।
ब्रह्म कुंड का कचरे का ढेर
भारी उपेक्षा के कारण यह तालाब कचरे का ढेर बन गया था और स्थानीय निवासी वास्तव में इसके अस्तित्व को भूल चुके थे। ब्रज मंडल क्षेत्र में इस प्रकार के कई अष्टकोणीय सरोवर हैं।
एक स्थानीय संत रमेश बाबा ने कहा कि दशकों से यह सरोवर उपेक्षित पड़ा था और कचरे के ढेर में बदल गया था। लेकिन बजरंग फाउंडेशन के कार्यकर्ताओं के प्रयास से यह फिर से जीवंत हो उठा है।
शहर के ही एक अन्य साधु राधा नाथ स्वामी ने कहा कि ब्रज फाउंडेशन के स्वयंसेवकों ने जो कार्य किया वह वाकई प्रशंसनीय है।
ब्रह्म कुंड को साफ करते ब्रज फाउंडेशन के स्वयंसेवक
सरोवर की गाद निकालने तथा इसके चारों ओर के पाल का नवीनीकरण करने के बाद स्वयंसेवकों ने तालाब को और इसके पास खाली पड़ी जमीन पर बाड़ भी खड़ी की। सरोवर के मध्य में कमल के पुष्प पर स्थित चार मुख वाले ब्रह्मा की मूर्ति भी स्थापित की गई।
ब्रह्म कुंड को साफ करते ब्रज फाउंडेशन के स्वयंसेवक
भारतीय प्रौद्यागिकी संस्थान, खड़गपुर के छात्र व इस परियोजना के निदेशक राघव मित्तल ने आईएएनएस को बताया कि कमल पुष्प की हर पंखुड़ी से पानी की धारा निकलती रहती है। जबकि तालाब के चारों ओर लगाए गए पौधों के लिए फव्वारे भी लगाए गए हैं।
मित्तल इस पूरी परियोजना के खिलाफ कुछ समूहों द्वारा खड़ी की गई मुश्किलों को याद करते हैं।
उन्होंने कहा, “स्थानीय राजनीतिज्ञों ने हर तरह की समस्याएं व आशंकाएं खड़ी कीं। तालाब के चारों ओर किए गए अतिक्रमण के कारण मशीनों को वहां चला पाना बहुत कठिन था। लेकिन हमने धैर्य से काम लिया और अंतत: हमें सफलता मिली।”
Indian Water Portal.
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