Friday, January 1, 2010

प्रीत, प्यार, स्नेह और संबंधों की धरा पर

वृन्दावन, नंदगाँव, बरसाना, ये वो जगह है जहाँ पर श्री कृष्ण-राधा के अलावा कुछ भी नहीं है। गत पांच दिनों में से चार दिन इन्ही के सानिध्य में गुजरे।

राधा कभी थी या नहीं, लेकिन आज इन स्थानों के चप्पे चप्पे पर राधा ही राधा है। बहती हवा राधा राधा करके कान के पास से उसके होने का अहसास करवाती है। दीवारों पर राधा, श्री राधा लिखा हुआ है। एक रिक्शा वाला भी घंटी नहीं बजाता, राधे राधे बोलकर राहगीरों को रास्ता छोड़ने को कहता है।

वृन्दावन में ५५०० मन्दिर हैं। सब के सब राधा कृष्ण के। बांके बिहारी का मन्दिर, कोई समय ऐसा नहीं जब भीड़ ना होती हो। मन्दिर में आते ही मन निर्मल हो जाता है। आंखों के सामने, मन में केवल होता है बांके बिहारी। रास बिहारी मन्दिर। मन्दिर में चार शतक पुरानी मूर्तियाँ हैं। मगर ऐसा लगता है जैसे आज ही उनको घडा गया हो। मन्दिर का रूप रंग देखते देखते मन नहीं भरता।

श्री रंगराज का मन्दिर। मन्दिर में सोने की मूर्तियाँ, उनके सोने के वाहन, सोने के गरुड़ खंभ। क्या कहने! गोवर्धन की परिकर्मा। लोगों की आस्था को नमन करने के अलावा कुछ करने को जी नहीं हुआ। वहां के लोग कहते हैं। वृन्दावन,नंदगाँव,बरसाना दूध दही का खाना। इस क्षेत्र में ताली बजाकर हंसने का भी बहुत महत्व है। हर किसी से सुनने को मिल जाएगा-जो वृन्दावन में हँसे,उसका घर सुख से बसे। जो वृन्दावन में roye वो अपने नैना खोये।

वहां मधुवन है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ श्री कृष्ण गोपियों के संग रास रचाया करते थे। अब भी ऐसा होता है। इसलिए मधुवन में रात को किसी को भी रुकने नही दिया जाता। बाकायदा ढूंढ़ ढूंढ़ कर सबको वन से बहार निकल दिया जाता है।

वृन्दावन में बंदरों का बहुत बोलबाला है। लेकिन आप उनके सामने राधे राधे बोलोगे तो बन्दर चुपचाप आपके निकट से चला जाएगा। इन बंदरों को चश्मा और पर्स बहुत पसंद हैं। पलक झपकते ही आपका चश्मा उतार लेंगें। इसलिए जगह जगह लिखा हुआ है कि चश्मा और पर्स संभाल कर रखें।

यहाँ एक मन्दिर है इस्कोन। मन्दिर में कैमरा मोबाइल फ़ोन तक नहीं ले जा सकते। मन्दिर के अन्दर आरती के समय जब "हरे कृष्णा हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे" के स्वर गूंजते हैं तो हर कोई अपने आप ही झुमने को मजबूर हो जाता है। कृष्ण नाम की ऐसी मस्ती आती है की मन्दिर से जाने को जी नहीं करता।

मथुरा तो है ही कृष्ण की जन्म स्थली। जन्म स्थली पर सी आरपीएफ की चौकसी है। सब कुछ देखने लायक। चार दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। अब उस व्यक्ति के बारे जिसकी भावना के चलते हम इन स्थानों के दर्शन कर सके। उनका नाम हैं श्री मारुती नंदन शास्त्री। कथा वाचक हैं, मुझ से स्नेह करतें हैं। उनका कोई आयोजन था। उन्होंने स्नेह से बुलाया और हम कच्चे धागे से बंधे चले गए। कहतें हैं कि वृन्दावन में किसी ना किसी बहाने से ही आना होता है। अगर आप सीधे वृन्दावन आने को प्रोग्राम बनाओगे तो आना सम्भव नही होता। इसलिए शास्त्री जी को धन्यवाद जिनके कारन हम प्रेम की नगरी में आ सके।

प्रस्तुतकर्ता नारदमुनि पर

Sunday, March 29, 2009

देवि अपावृणु

अद्याहं चिन्तयामि किमत्र लिख्यत इति। बहूनि दिनानि व्यतीतानि सन्ति तथापि अहं न किञ्चिल्लिखितवानस्मि। तदेव किञ्चिल्लिख्यतामेव।

इदानीं कुत्राप्यपठं यत् कस्या अपि भाषायाः शिक्षार्थी अवश्यं तस्यां नवभाषायां शृणोतु वदतु पठतु लिखत्वपि च। अहं सर्वं करोमि किन्तु लिखने खलु पश्चात्पादो।स्मि।

मम लिखनमात्रे कारणीभूते सति यस्मिन् कस्मिंश्चिद् एव विषये लिखितुं शक्नोमि। साध्वसाध्वोरुपाधेयानुपधेययोश् चिन्तनम् अपि व्यर्थम्। उल्लेख्यं तु मम गणनायन्त्रस्य साम्प्रतदेवनगर्यक्षरमुद्रणेऽक्षमता यदर्थे अहं महानुभवानां पठकानां क्षन्तव्यः। स्वयन्त्रे कर्मारभ्यतां तदा यथासमये पुनः देवनगरीलिप्यां लिखिष्ये।

गतकल्ये देवीचन्द्रवदन्याः श्रीमन्दिरे सचात्रगणो गतवान्। भावाभिभूतो भूत्वा आंग्लाभाषायामेकां कवितां अहमरचयं यस्याः संस्कृतानुवादोऽत्र निबध्यते



पर्वतशिखरं प्राप्ताः।
अन्तिमार्धक्रोशमेव चरणैश्चलिताः ।
तत्र सोपानान्यप्यासन् अतो न वयं
पर्वतारोहकवीरा इति वाच्यम्।
तथापि तु वायुमण्डलस्यागाढत्वे
शिरांसि घूर्णन्तेऽस्माकम्।

चिलपक्षिणोऽस्माकमधश्चक्रवद्घूर्णन्तः,
तदधःस्थितक्षेत्रखण्डानामुपर्युत्पतन्तीति वीक्षामहे।

पार्श्ववर्तिपर्वतशृग़्गाणि परिष्वज्य
चिन्नमेघखण्डाः कालिदासस्य दूत इव विश्रमन्ते।
ते किं यक्षसः कमपि नवसन्देशमपेक्षन्ते?
किं वा शक्तिं सञ्चार्य नातिदूरे दिक्चक्रवाले
दृष्टं हिमाचलं पुनर्गन्तुं प्रवर्तिष्यन्ते?

ढाकढोला धमधमायन्ते,
देवीमन्त्रा गुञ्जन्ते, सप्तशतिर्कलकलं शब्दायते,
प्रार्थकाः फुत्कुर्वते, घण्टा भृशं क्वणन्ते।
अस्मिन् कोलाहल एकं नारिकेलं क्रीणामि,
तव चरणे च तमर्पयामि चन्द्रानने।

हे योगमाये!
एतस्य श्वेतनीलस्य स्फटिकाकाशस्य नीचे
तव सकाशे पुनरागतोऽस्मि--
यथा पूर्वे वृन्दावने उल्लासमयपरिक्रमणे,
यथा च नवद्वीपे मध्यरात्रौ
प्रौढमातृकायाः प्रसृताणां कालानां शाखानां नीचे, तथा।

यदर्थे आशां सततं वर्धन्त्यस्से,
न तु कदापि यच्छसि,
तदर्थमेव पुनः प्रार्थयामि।
भिक्षां देहि। अपावृणु अपावृणु।

अस्मादतीवोच्चस्थानात् देवि पौर्णमासि,
यस्मात्त्वं खलु जगन्नृत्यमानमोहजवनिकया वृणोषि
पुनः पुनः प्रार्थयामि -- अपावृणु अपावृणु।

दन्ते तृणकं दष्ट्वा इदमपि पृच्छामि
कस्मात् युगलकिशोरं पृथक् करोषि ?
किमर्थं तौ दिशां हापयित्वा भ्रामयसि
कण्टकाकीर्णे सरीसर्पदुष्टे वृन्दावने वने ?
कथं राधां मानेन धापयसि ?
कथं वा कृष्णं बद्धतस्करम् इव निःशक्तिकं करोषि,
येन स वृक्षान् खगांश्च भवतीमप्य् आश्रयति ?

सरलीभव देवि। जवनिकामपावृणु
तयोर्नित्यदिव्यानन्दं लीलामेव दर्शय।
नूनं तुभ्यं तयोरपार्थकं पृथक्त्वम् रोचते।
ननु तत् सर्वं तव कला
किन्तु लीलेयं मम हृदये शैलम् इव कषति।

देवि अपावृणु अपावृणु।

Thursday, September 25, 2008

युगल उपासना

हिन्दी में बहुत सारे वेबब्लाग नहीं हैं और वैष्णव धर्म के सम्बन्धित ब्लाग नहीं के बराबर हैं। इस लिये मैं सोच रहा हूं यहां क्या लिखूं ? मेरी इच्छा नहीं है कि बच्चों के लिये एक प्राथमिक शिक्षा दूं, क्योंकि जब प्रेम इस धर्म का मुख्य प्रयोजन है, तब इसी की आलोचना अत्यावश्यक है।

मैं आजकाल ऋषिकेश शहर में निवास करता हूं और श्री श्री राधारससुधानिधि का नित्यपाठ चलता रहता है कोयील घाटि वृन्दावन आश्रम ट्रास्ट के मन्दिर में। इस के सिवा मैं शनिवार एवं रविवार को मधुबन के मन्दिर में भगवद्गीता पर कुछ आलोचना करता हूं। आपको निमन्त्रित करता हूं। आइये, श्रोता हों तो वक्ता का भी आनन्द बढता है।

दोनों पाठों में राधा की महिमा कीर्तन करने से मुझे ज्यादा आनन्द मिलता है। इस का सहज कारण यही है कि राधारानी, जिनको हम महाभाव स्वरूपिणी एवं भगवान् की आह्लादिनी शक्ति कहा करते हैं, हमारी मूल इष्टदेवता हैं ही।

जिस को वैष्णव सिद्धान्त के बारे में थोडा सा ज्ञान भी है, वह जानेगा कि वैष्णव धर्म का एक अत्यन्त लम्बा इतिहास है और इस के दौरान इस धर्म का स्वरूप बार बार परिवर्तित हुआ। पहले तो नारायण उस का इष्टा था, बाद में दूसरे दूसरे देवताएं नारायण तत्त्व में शामिल हो गये, जिन को भगवान के अवतार स्वरूप से गृहीत या स्वीकृत हुए।

उन में वासुदेव कृष्ण एक ही था। और वासुदेव में भी कृष्ण नामक यादवों की प्रिय देवता सम्मिलित हो गये। अहिस्ता अहिस्ता कृष्ण की प्रधानता बढती रही और लोग जानने लगे कि कृष्ण का नाम का व्युत्पत्त्यर्थ से - जो आकर्षण करता है - उस की भगवत्ता के सर्व श्रेष्ठ अनुमान किया जा सकता है। वैसे ही कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् हो गया।

जैसे श्रील रूप गोस्वामी ने कहा-

सिद्धान्ततस्त्वभेदोऽपि श्रीशकृष्णस्वरूपयोः।
रसेनोत्कृष्यते कृष्णो रूप एष रसस्थितिः॥

सिद्धान्त या तत्त्व की ओर से विचार करते हुए हम बोल सकते हैं कि श्रीश नारायण और कृष्ण एक ही वस्तु या तत्त्व है। जैसे नारायण भगवान् है, वैसे ही कृष्ण भगवान् ही है। भगवान् के अनेक स्वरूप हैं, इस में क्या उलझन ? लेकिन अगर हम रस की ओर से विचार करें तो हमें स्थिर करना होगा कि कृष्ण का स्वरूप उत्कृष्ट है, क्यों कि यह रूप रस की स्थिति है।

देखिये, उपनिषदों में रसो वै सः कहा गया है - परम् ब्रह्म रस है। और यह रस का जो आस्वादन करेगा, वही आनन्दी भवति। इस आनन्द का नामान्तर है प्रेम। क्यों कि जिस किसी कारण से हो न क्यों जहां से आनन्द मिलता है, उस में हमारा प्रेम जाता है। और मूल वस्तु, परमार्थ वस्तु, रसराज भगवान् से जो आनन्द मिलता है, वह असमोर्ध्व है। भूमैव सुखम्। उसी में हमारा परम प्रेम होना स्वाभाविक है।

श्रीमद्भागवत्पुराण में इस पर भगवान् में एक वैशिष्ट्य आविष्कृत हुआ। भगवान् भक्त-भक्तिमान्। भगवान् भक्ति अधीन है। अहं भक्तपराधीनो कहते हैं भगवान्। इस का सुन्दर सूत्र माठरनामक किसी श्रुति में मिलता है-

भक्तिरेवैनं नयति भक्तिरेवैनं दर्शयति
भक्तिवशः पुरुषः भक्तिरेव भूयसी

भक्ति भगवान् को हमारे पास लाती है। भक्ति हमें भगवान् का साक्षात्कार देती हैं। भगवान् भक्ति का बस हैं। अत: भक्ति निश्चय ही सर्व प्रधान तत्त्व होंगी।

मध्ययुगीय भक्ति आन्दोलन में श्री चैतन्य महाप्रभु आदि क्रन्तिकारीं महापुरुषों ने फिर एक नया आविष्कार किया, जिस का नाम है राधा। अगर भक्ति भगवान् से बलवती है, तब जो भक्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं, वह महाभाव स्वरूपिणी आह्लादिनी शक्ति स्वरूपिणी श्रीमती राधारणी निःसन्देह कृष्ण से भी बलवती होंगी।

इस का नतीजा हुआ कि राधारणी को छोडकर कृष्ण की भजना करना दम्भा मात्र देखा गया है, अर्थात् अकेला कृष्ण का भजन निरर्थक बन गया। युगल ही भगवान् का वास्तव स्वरूप देखा गया है, और युगल उपासना सर्वोच्च उपासना ।

इमौ गौरीश्यामौ मनसि विपरीतौ बहिरपि
स्फुरत् तत्तद्वस्त्राविति बुधजनैर्निश्चितम् इदम्।
स कोप्यच्छप्रेमा विलसदुभयस्फूर्तिकतया
दधन्मूर्तिभावं पृथगपृथगप्याविरुदभूत्॥

ये गौरी राधा और श्याम कृष्ण जो सामने बैठते हैं उन के मन में विपरीत देखा जाता है। अर्थात् राधा गौरी है लेकिन कृष्ण की चिन्ता करने के परिणति यही हु कि उस के मन काला हो गया। और कृष्ण काला है लेकिन राधा की चिन्ता करते करते उस का मन भी गौर वर्ण हो गया। और एक बात है कि बहिरपि उन के वस्त्रों के द्वारा यही प्रमाणित हुआ क्यों कि कृष्ण का पीतवसन है और राधारनि की नीलाम्बरी। फलतः विद्वान् लोग विचार करके इस सिद्धान्त पर आनीत हु कि को अतीव निर्मल स्वच्छ प्रेम इन दो रूपों में स्फूर्ति प्राप्त हुआ इन दो मूर्तिं को धारण किया एक प्रेम वस्तु ने दो रूप धारण किया पृथक् व अपृथक्।

राधा कृष्ण एक तत्त्व दो देह धारण करके परस्पर रस और लीला आस्वादन करते रहते हैं।

आज यहां तक ।

जय श्री राधे श्याम


मङ्गलाचरणम्

व्रजेन्द्रसुतप्रेयसीचरणपद्मसेवाग्रहो
मुहुर्हि हरिनाम यो रतधिया गृणाति प्रियम् ।
तमेव किल दर्शकं मधुररागभक्त्यध्वनो
नमामि करुणामयं हि ललिता-प्रसादं प्रभुम् ॥

जनकगुरुसमक्षमानुगत्येऽतिदक्ष
विदितविहितदीक्ष लब्धवात्सल्यशिक्ष ।
भजनगतमनस्क साधुचर्यातितीक्ष्ण
विगतजगदपेक्ष रक्ष मां सिद्धकक्ष ॥

नित्यानन्दकृपाजलेन सिचितः श्रीजाह्नवाधारया
प्रेम्णा गौरगदाधरेति युगलं यस्तत्त्ववित् सेवते।
तं त्वां गोद्रुमवासिनां मुकुटगं रूपानुगानां वरं
हे श्रीभक्तिविनोद देव परया भक्त्या नमामो वयम्॥

--o)0(o--

यह नया ब्लाग का नाम है प्रेम प्रयोजन। गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय का सिद्धान्त है कि प्रेम ही पञ्चम पुरुषार्थ है। प्रेम का अर्थ मुख्यतः भगवत्प्रेम है लेकिन उसका आनुषङ्गिक फल और रूपान्तर है मनुष्य प्रेम। अधिकं तु, हमारा सिद्धान्त है कि मनुष्य प्रेम भी भगवत्प्रेम प्राप्ति का एक मुख्य साधना हो सकता है।

बहुत दिनों से मेरा अंग्रेजी ब्लाग है। जिन पाठकों को अंग्रेजी आती है वे वहां मेरे सब मतादि विस्तार से देख सकते हैं। मेरी मातॄभाषा अंग्रेजी है, लेकिन आजकाल मैं भारतवर्ष में रहा करता हूं, इस लिये हिन्दी में भी ब्लाग करने की इच्छा हुई । भ्रम-प्रमादादि अनिवार्य होंगे, इस लिये उदार पाठकों की क्षमा प्रार्थना कर रहा हूं।

जय श्री राधे श्याम !!