Friday, August 13, 2010

श्रीवृन्दावनमहिमामृतम् ३.२५-२७


श्री रघुनाथदास गोस्वामी की समाधि, राधाकुण्ड (Photo from Lake of Flowers).



पुष्पात् पुष्पफलादिसम्पदखिलाश्चर्यं महामाधुरी
पूरं दूरनिरस्तदुःखदुरितादुद्वर्धमानच्छवि ।
सान्द्रानन्दसुधार्णवोदितमहाद्वीपेन्द्रुवृन्दावने
वृन्दं सुन्दरशाखिनामनुदिनं वन्दे मुनीन्द्रैर्नुतम् ॥

आनन्दघन समुद्र में उदित महाद्वीप के चन्द्र समान जो यह श्रीवृन्दावन है, उसमें प्रफुल्लित, फूलफलादि सम्पत्ति वाले, सबके लिये अथवा समस्त आश्चर्य को उत्पन्न करने वाले महामाधुर्य से पूर्ण दुःखपापादि को दूर फैंकने वाले, निरन्तर वृद्धशील कान्ति वाले एवं मुनीद्रगण भी जिनकी स्तुति करते हैं, ऐसे वृक्षों को प्रतिदिन मैं वन्दना करता हूं ॥३.२५॥




पुष्पश्रेणिविकाशहासयुतया गुच्छोरुवक्षोजया
संश्लिष्टाः पुलकालिमण्डितलता वध्वाप्यहो सत्तमाः ।
कृष्णध्यानरसान् मुहुः पुलकिनो माध्वीकधारास्रवो
नात्मानं च परं च जानत इमे वृन्दाटवीशाखिनः ॥

अहो ! पुष्प के विकाशरूप हास्य से, फूलों के गुच्छरूप स्तनों से जो शोभित हैं, एवं पुलकरूप सखियों से जो वेष्टित हैं, ऐसी लतारूप वधुओं के द्वारा ये श्रीवृन्दावन के वृक्ष आलिङ्गित होकर श्री-कृष्ण के ध्यान रस में बारम्बार पुलकित हो रहे हैं,एवं मधुधारा के छल से अश्रु प्रवाह कर रहे हैं, ये अपना पराया कुछ भी नहीं जानते ॥३.२६॥




येषामादाय दिव्यं कुसुमकिशलयं तौ मिथः प्रेममूर्ती
गौरश्यामौ किशोरावति चतुरतमौ वेणिचूडादि कृत्वा ।
पौष्पं निर्माय गेहं शयनमथ फलं प्राश्य सीधूनि पीत्वा
दुर्वाते दिव्यकेलिं त उरुतरुवरा भान्ति वृन्दावनीयाः ॥

जिनके दिव्य पुष्प और पल्लव लेकर वे प्रेम मूर्ति अति चतुरतम गौर श्याम युगलकिशोर परस्पर वेणी व चूड़ा बनाते हैं, एवं पुष्प गृह और पुष्पशय्यादि की रचना करते हैं, जिनके फल भोजन करके तथा विविध मधुपान करके वे दिव्य केलि में प्रवृत्त होते हैं, वे श्रीवृन्दावन के महावृक्षराज शोभा पा रहे हैं ॥३.२७॥


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