Wednesday, August 25, 2010

श्रीवृन्दावनमहिमामृतम् ३.६२-६४


बरसाना (Photo from Lake of Flowers).




प्रसीद श्रीवृन्दावन वितनु मां स्वैकतृणकं
यदङ्घ्रिस्पर्शात्युत्सवमनुभवेत्त्वय्युदितयोः ।
तयोर्गौरश्यामाद्भुतरसिकयूनोर्नवनव
स्मरोत्कण्ठाभाजोर्निभृतवनवीथ्यां विहरतोः ॥
हे वृन्दावन ! अपना एकमें क्षुद्र तृण कृपाकर मुखे दान करो, जो तुम्हारे बीच विराजमान नव नव कामोत्कण्ठयुक्त, निर्जन वनपथ में विहार करने वाले उन गौरश्यामवर्ण अद्भुत रसिकयुगल के चरणकमलों के स्पर्श का सुख अनुभव करता रहता है ॥३.६२॥




न कालिन्दीमिन्दीवरकमलकह्लारकुमुदा
दिभिर्नित्योत्फुल्लैर्मधुपकुलझङ्कारमधुरैः ।
सहालिश्रीराधामुरलिधरकेलिप्रणयिनीम्
अपश्यन् यो वृन्दावनपरिसरे जीवित स किम् ॥
नीलोत्पल, कमल, कह्लार और कुमुदिनी आदि पुष्पों से प्रफुल्लित, भंवरों की गुञ्जार से मधुर एवं जिसमें सखियों के सहित श्रीराधा-मुरलीधर केलि करते हैं, ऐसी श्रीयमुना जी के, श्रीवृन्दावन में जो व्यक्ति विना दर्शन किये जीवित रहता है, उसे क्या लाभ ? अर्थात् उसका जन्म वृथा है ॥३.६३॥




वृन्दारण्यमिलत्कलिन्दतनयां वन्देऽरविन्देन तां
नानारत्नमयेन नित्यरुचिरामानन्दसिन्धुस्रुताम् ।
रम्यां चान्यविचित्रदिव्यकुसुमैर् गम्यां न सम्यक् त्रयी
मौलीनामपि मत्तषट्पदखगश्रेणीसुकोलाहलाम् ॥
श्रीवृन्दावन से संयुक्त उस श्रीयमुना जी को मैं नमस्कार करता हूं, जो अनेक प्रकार के रत्नमय कमलों से नित्य मनोहर हो रही है, एवं आनन्द समुद्र की कन्या है, अन्योन्य विचित्र दिव्य कुसुमों से सुशोभिता है, ऋक्, साम, यजु वेदत्रय शिरोमणि भी जिसकी सम्यक् महिमा को नहीं जान सकते एवं मत्त मधुकरों तथा विविध पक्षियों के कोलाहल से मुखरित हो रही है ॥३.६४॥


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