Saturday, August 21, 2010

श्रीवृन्दावनमहिमामृतम् ३.५०-५२


बरसाने का दृश्य (Photo from Lake of Flowers).




उद्दामः काम एवेतररसलवकस्पर्शमात्रासहिष्णु
नित्यं वर्धिष्णुरत्युच्छलितरसमहाम्भोधि नित्यं च यत्र ।
यत् किञ्चिज्जङ्गमस्थास्नु च परममहाश्चर्यनानासमृद्ध्या
शश्वद्वृद्ध्या स्वयं चानिशमुदितमिदं भातु वृन्दावनं मे ॥
जो स्थान उत्कट काम स्वरूप है, अन्य रसों के थोड़े स्पर्श में को भी जो सहन नहीं करता, जिस स्थान पर नित्य वर्धन शील रति के द्वारा उच्छलित रस महासमुद्र नित्य प्रवाहित होता है, जहां स्थावर जङ्गम समस्त वस्तुएं परम महाश्चर्यमय अनेक समृद्धि और निरन्तर वृद्धि के साथ रात दिन प्रकाशित होती हैं, वही यह श्रीवृन्दावन मेरे हृदय में प्रकाशित हो ॥३.५०॥




तथा परमपावनं भुवि चकास्ति वृन्दावनं
यथा हरिरसे मनः स्वयमनङ्कुशे धावति ।
परन्तु यदि तद्गतस्थिरचरेषु नो कायवाङ्
मनोभिरपराधिता भवति बाधिता तत्त्वधीः ॥
जैसे स्वतन्त्र हरिरस में स्वयं ही धावित होता है, वैसे ही परम पावन श्रीवृन्दावन पृथिवी मण्डल में प्रकाशित होता है, परंतु यदि श्रीवृन्दावन के स्थावर जङ्गमात्मक वस्तुओं के प्रति काय-मन-वाक्य से अपराधी होकर तत्त्व विचार बुद्धि बाधित न हो, अर्थात् अपराधी होने में तत्त्व बुद्धि नाश हो जाती है, जिससे श्रीवृन्दावन के प्रकाश का अनुभव नहीं होता ॥३.५१॥




मग्नं श्रीराधिकाश्रीमुरलिधरमहाप्रेमसिन्धौ निमग्नं
तद्गौरश्यामगात्रच्छविमयजलधौ प्रोज्झितावारपारे ।
शोभामाधुर्यपूर्णार्णवबुडितमहोमत्तमेतन् ममान्तः
श्रीवृन्दारण्यमेव स्फुरतु न कलितं माययाविद्यया च ॥
अहो ! श्रीराधा एवं मुरलीधर के महाप्रेमसिन्धु में मग्न एवं उस गौरश्याम विग्रह के कान्तिमय आर-पार-विहीन समुद्र में जो निमग्न है, तथा उनकी शोभा और माधुर्य के सागर में डूबा हुआ मत्त यह श्रीवृन्दावन, जो मेंयति एवं अविद्या का रचा नहीं, मेरे अन्तःकरण में स्फुरित हो ॥३.५२॥


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